पुराने किले में बोए गए थे महाभारत के बीज

पुराने किले का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे पांडवों का किला भी कहते हैं। जब-जब इसकी खुदाई होती है, तो परत दर परत इतिहास की कड़ियां खुलती जाती हैं। पुराने किले में महाभारत काल से जुड़े अवशेष भी मिले हैं। वास्तव में महाभारत के बीज पुराने किले में ही बोए गए थे।
महाभारत की पूरी इबारत पुराने किले में ही लिखी गई थी। दरअसल हस्तिनापुर का राज्य कोरव और पांडवों में बांट दिया गया था। कोरवों के पास हस्तिनापुर का आधा राज्य रह गया था और पांडवों को खांडवप्रस्थ मिला था, जो बीहड़ जंगल और बंजर भूमि से युक्त था। यहां नागवंश के राजा तक्षक का अधिकार था। श्रीकृष्ण की सहायता से पांडवों ने खांडवप्रस्त को जलाकर खाक कर दिया और नागवंशियों को मार कर यहां से भगा दिया।
श्रीकृष्ण के आग्रह पर मय दानव ने खांडवप्रस्त में एक ऐसी सुंदर नगरी का निर्माण किया, जो इंद्र की अल्कापुरी के समान सुंदर थी। इसलिए इसका नाम इंद्रप्रस्थ रखा गया। जब यह नगरी बन कर तैयार हो गई, तो पांडवों ने कोरवों को इसे देखने के लिए आमंत्रित किया। बस, यहीं तैयार हो गई महाभारत की पृष्ठभूमि। इंद्रप्रस्थ महल में एक ऐसा तालाब था, जो देखने में घास के मैदान जैसा लगता था। जैसे ही दुर्योधन ने इस मैदान पर पैर रखा, वह तालाव में गिर पड़ा। तब पांडवों सहित द्रोपदी ने दुर्योधन की हंसी उड़ाई। इतना ही नहीं, द्रोपदी ने तो दुर्योधन को यहां तक कह डाला, ‘‘अंधे का पुत्र अंधा।’’
कहते हैं कोई भी महायोद्धा सौ वार सीने पर खाकर भी दुश्मनी को भुला सकता है, पर एक स्त्री द्वारा सार्वजनिक तौर पर किए गए अपने पिता के अपमान को कभी नहीं भूल सकता और जो पिता एक सम्राट हो? बस, द्रोपदी के इस चार अक्षर के वाक्य ने महाभारत की नींव रखी थी और उसका मूक गवाह यह पांडवों का किला ही था, जिसे आज हम पुराना किला कहते हैं। आज भी पुराने किले के अंदर कुंती का एक मंदिर है, जो पांडवों की मां थीं। ऐसा माना जाता है कि वह वहां पूजा करती थीं।
इतिहासकारों के अनुसार पूर्व ऐतिहासिक काल में जिस स्थल पर इंद्रप्रस्थ बसा हुआ था, उसी के ऊंचे टीले पर 16 वीं शताब्दी में पुराना किला बनाया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस किले की कई स्तरों पर खुदाई की है। खुदाई में प्राचीन भूरे रंग से चित्रित पकी हुई मिट्टी के विशेष प्रकार के बरतन और कई अन्य वस्तुओं के अवशेष मिले हैं, जो ईसा से कई सदी पहले के हैं। ऐसे ही बरतन व अन्य वस्तुएं दूसरे महाभारत काल के स्थलों से भी पाए गए हैं। इस बारे में एक तथ्य यह भी है कि इंद्रपरत नाम का एक गांव पुराना किले के स्थान पर स्थित था। जब अंग्रेजों ने नई दिल्ली का निर्माण किया, तो अन्य गांवों के साथ इंद्रपरत नाम के इस गांव को भी यहां से हटा दिया था। दिल्ली में स्थित सारवल गांव से 1328 ईस्वी का संस्कृत का एक अभिलेख भी प्राप्त हुआ है। यह अभिलेख लाल किले के संग्रहालय में संग्रहित है। इस अभिलेख में इस गांव के इंद्रप्रस्थ जिले में स्थित होने का उल्लेख है।
इंद्रप्रस्त का एक और रोचक प्रसंग है। इसके अनुसार पांडवों ने कौरवों से केवल पांच गांव मांगे थे। ये वे गांव थे, जिनके नामों के अंत में पत शब्द लगा हुआ है। यह संस्कृत के प्रस्थ का हिंदी में पयार्यवाची शब्द है। ये पत वाले गांव हैं- इंद्रपत, बागपत, तिलपत, सोनीपत और पानीपत हैं। जिन स्थानों के नाम दिए गए हैं उनमें ओखला नहर के पूर्वी किनारे पर दिल्ली के दक्षिण में लगभग 22 किलोमीटर दूरी पर तिलपत गांव स्थित है। यहां से मिट्टी के बरतन प्राप्त हुए हैं, जो महाभारत काल के हैं।
पुरातत्व विभाग ने पुराने किले के दक्षिण पूर्वी भाग में सन 1955 में कुछ खुदाई की थी। वहां से कुछ मिट्टी के पात्र मिले थे, जो महाभारत की कथा से जुड़े अन्य स्थानों से प्राप्त वस्तुओं से मेल खाते थे। इसलिए यह धारणा प्रवल हो गई कि इंद्रप्रस्त के खंडहरों के ऊपर ही इस किले का निर्माण किया गया था। पुराने किले की पूर्वी दीवार के पास जब दोबारा 1969 से 1973 के बीच खुदाई की गई, तो वहां से महाभारत काल की बस्ती के कोई प्रमाण तो नहीं मिले, लेकिन 300 ईसापूर्व मौर्य काल से लेकर प्रारंभिक मुगल काल तक मानव बसावट के सभी प्रमाण मिल गए। इन प्रमाणों में उस काल के सिक्के, मनके, मिटटी के बरतन, पकी हुई मिटटी की यक्ष-यक्षियों की छोटी-छोटी प्रतिमाएं, लिपि युक्त मुद्राएं (सील) आदि प्रमुख हैं। खुदाई में प्राप्त सभी वस्तुओं को इस किले के संग्रहालय में प्रर्दिशत किया गया है।
माना यह जाता है कि इस वर्तमान किले का पुनर्निमाण शेरशाह सूरी ने 1538 से 1545 के बीच करवाया था। मगर पहले यह किला हुमायूं के ‘दीनपनाह’ शहर का आंतरिक किला था। कहते हैं कि मुगल सम्राट हुमायूं ने यमुना नदी के किनारे उसी टीले पर अपना शहर ‘दीनपनाह’ बसाया था, जहां पहले कभी पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ थी। शेरशाह सूरी ने हुमायूं पर विजय प्राप्त कर इस नगर के सभी भवनों को नष्ट कर दिया। बाद में उसने यहीं अपनी राजधानी ‘शेरगढ़’ का निर्माण किया। इसी बीच हुमायूं ने फिर से संगठित होकर शेरगढ़ पर आक्रमण कर दिया और अपनी खोई हुई सल्तनत वापस प्राप्त कर ली। इसकी दीवारें 4 मीटर मोटी और 18 मीटर तक ऊंची हैं।
पुराना किला मूलतया यमुना नदी के तट पर ही बना था, लेकिन उत्तर और पश्चिम दिशाओं के ढलान से पता चलता है कि नदी को जोड़ती हुई एक खाई सुरक्षा के दृष्टि से यहां बनी थी। इस किले की चारदीवारी लगभग 2.4 किलोमीटर लंबी है और इसके तीन मुख्य दरवाजे उत्तर, पश्चिम और दक्षिण में हैं। इनमे से पश्चिमी दरवाजे का इस्तेमाल आजकल किले में प्रवेश के लिए किया जाता है। यहां जो छतरियां बनी हैं, वे हिंदू वास्तुकला को प्रर्दिशत करती हैं। इसीलिए यह किला हिंदू, मुगल तथा अफगानी वास्तुकला के समिश्रण का एक सुंदर उदाहरण माना जाता है।
प्रमुख आकर्षण:
* तीन विशाल और भव्य प्रवेश द्वार: बड़ा दरवाजा, हुमायूं दरवाजा और तलाकी दरवाजा। किले में पश्चिम की ओर बड़ा दरवाजा है, जो आज भी उपयोग में आ रहा है। दक्षिण प्रवेश द्वार को ‘हुमायूं गेट’ के नाम से जाना जाता है। इस प्रवेश द्वार को हुमायूं ने बनवाया था। यहां से हुमायूं का मकबरा भी दिखाई देता है। उत्तर की ओर के आखरी प्रवेश द्वार को ‘तलाकी गेट’ कहते हैं। इसे ‘निषिद्ध द्वार’ के रूप में भी जाना जाता है। यह स्पष्ट नहीं है कि कब और क्यों इस दरवाजे के उपयोग को प्रतिबंधित किया गया था। सभी द्वार दो मंजिला बलुआ पत्थरों की संरचनाएं हैं। किले में झरोखे और छतरियां राजस्थानी वास्तुकला की याद ताजा करती हैं, और जो बाद के मुगल वास्तुकला में दोहराई गई हैं।
* किला-ए-कुन्हा मसजिद: यह पूर्व-मुगल स्थापत्य शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण 1541 में शेरशाह सूरी ने करवाया था। यह एक गुंबद वाली मसजिद है, जिसमें पांच प्रवेशद्वार हैं। यह लाल बलुआ पत्थार से बनी है, जिसमें सफेद संगमर से नक्काशी की गई है। पुराने किले में यह सबसे सुंदर और सुरक्षित संरचना है। एक समय इसके प्रांगण में एक फब्बारा भी था।
* शेर मंडल: यह एक अष्टकोणीय दो मंजिला इमारत है, जो शेरशाह के नाम पर है औऱ इसे शेरशाह सूरी ने पूरा करवाया था। लेकिन कहा यह जाता है कि इसका निर्माण बाबर ने अपने पुत्र हुमायूं के लिए एक वेधशाला और पुस्तकालय के रूप में करवाया था। यह लाल बलुआ पत्थर से बनी दो मंजिला इमारत है। यहीं पर एक बार पुस्तकों को उठाए हुए जब हुमायूं सीढियों से उतर रहा था, तभी उसे अजान (इसलामी प्रार्थना) की पुकार सुनाई पड़ी। हुमायूं की आदत थी कि अजान की पुकार सुनते ही, वह जहां कहीं भी होता, झुक जाया करता था। झुकते समय उसके पैर लंबे लबादे में कहीं फंस गए और वह संतुलन खोकर सीढ़ियों से गिर पड़ा। इस दुर्घटना से 1556 में उसकी मृत्यु हो गई।
* संग्रहालय: यह संग्रहालय पुराले किले के अंदर ही स्थित है। यहां इस क्षेत्र में खुदाई से प्राप्त वस्तुओं को संग्रहीत करके रखा गया है।
* लाइट एंड साउंड शो: यह शो शाम को किले के अंदर आयोजित किया जाता है। यह दिल्ली और इस किले के इतिहास से जुड़ी कई रोचक कहानियों को बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत करता है और उन पर प्रकाश डालता है।
* नौका विहार: पुराने किले के बाहर खाई में आज भी एक झील बनी है, जिसमें नौका विहार का अलग ही आनंद है।
* कुंती मंदिर: पुराना किला परिसर में ‘कुंती मंदिर’ भी है। ऐसा विश्वास है कि पांडवों की मां जिनका नाम कुंती था, इसी मंदिर में पूजा करती थीं।
* कैरुल मंजिल: इसका निर्माण शहंशाह अकबर की दाई मां महम अंगा ने करवाया था, बाद में यह मदरसा में तब्दील हो गया था।
* शेरशाह सूरी गेट: शेर शाह सूरी गेट या लाल दरवाजा पुराने किले का दक्षिणी द्वार था। यह कैरुल मंजिल के दक्षिण-पूर्व मथुरा रोड पर पुराना किला परिसर के विपरीत दिशा में है।
त्वरित सुझाव:
* स्थान: इंद्रप्रस्थ पुराना किला, प्रगति मैदान, नई दिल्ली
* निकटतम मेट्रो स्टेशन: प्रगति मैदान
* प्रवेश का समय: सूर्योदय से सूर्यास्त (सभी दिन खुला रहता है)
* प्रवेश शुल्क: 15 रुपए भारतीयों के लिए, विदेशियों के लिए 200 रुपए। 15 साल से छोटे बच्चों के लिए प्रवेश शुल्क नहीं है।
* किला घूमने के लिए लगने वाला समय: 1.5 से 2 घंटे
* फोटोग्राफी: स्टिल कैमरा ले जाने पर कोई शुल्क नहीं है। वीडियो कैमरे के लिए शुल्क देना पड़ता है।
* आसपास के आकर्षण: दिल्ली का चिड़ियाघर पुराने किले से सटा हुआ है। यहां भी दो से तीन घंटे आराम से बिताए जा सकते हैं। इंडिया गेट, चिल्ड्रेंस पार्क, निजाम-उद-दीन दरगाह, कनॉट प्लेस, पालिका बाजार, जनपथ और सुंदर नगर मार्केट सहित आसपास के क्षेत्रों में घूमा जा सकता है।

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