दिल्ली नाम कैसे पड़ा

दिल्ली शहर का नाम दिल्ली कैसे पड़ा, इसके कई तर्क हैं? कहते हैं ईसा से 50 वर्ष पूर्व एक मौर्य राजा थे, जिनका नाम था धिल्लु। उन्हें दिल्लु भी कहा जाता था। माना जाता है कि यहीं से अपभ्रंश होकर नाम दिल्ली पड़ गया। उनसे जुड़ी एक कहानी है। माना जाता है कि उनके सिंहासन के ऐन आगे एक कील ठोकी गई। कहा गया कि यह कील पाताल तक पहुंच गई है। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि जब तक यह कील है, तब तक साम्राज्य कायम रहेगा। कील काफी छोटी थी इसलिए राजा को शक हुआ। उन्होंने कील उखड़वा ली। बाद में यह दोबारा गाड़ी गई, लेकिन फिर वह मजबूती से नहीं धंसी और ढीली रह गई। तब से कहावत बनी कि किल्ली तो ढिल्ली भई। कहावत मशहूर होती गई और किल्ली, ढिल्ली और दिलु मिलाकर दिल्ली बन गया।

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि तोमरवंश के एक राजा धव ने इलाके का नाम ढीली रख दिया था, क्योंकि किले के अंदर लोहे का स्तंभ ढीला था और उसे वहां से बदला गया था। यह ढीली शब्द बाद में दिल्ली हो गया।

एक तर्क यह भी है कि तोमरवंश के दौरान जो सिक्के बनाए जाते थे, उन्हें देहलीवाल कहा करते थे। इसी से दिल्ली नाम पड़ा। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि इस शहर को एक-डेढ़ हजार वर्ष पहले हिंदुस्तान की दहलीज माना जाता था। दहलीज का अपभ्रंश दिल्ली हो गया।

महाराज पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंदबरदाई की हिंदी रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ में तोमर राजा अनंगपाल को दिल्ली का संस्थापक बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने ही ‘लाल कोट’ का निर्माण करवाया था।

मध्यकाल में लिखे गए ग्रंथ ‘पृथ्वीराज रासो’ में ‘किल्ली-दिल्ली’ की कथा कुछ इस प्रकार है-राजा अनंगपाल तोमर के लालकोट में एक लौह स्तंभ था। एक दिन राजा ने दरबार में बताया कि लौह स्तंभ पाताल में शेषनाग के फन पर टिका हुआ है, जिसने पृथ्वी को अपने फन पर संभाल रखा है। इस पर राज ज्योतिषी ने भविष्य वाणी की कि जब तक यह स्तंभ खड़ा रहेगा, तब तक यहां तोमर वंश का शासन चलता रहेगा।

राजा अनंगपाल तोमर को यह सुनकर बड़ी उत्सुकता हुई, उसने तुरंत उस लौह स्तंभ को उखाड़कर देखने का आदेश दिया। जब स्तंभ को उखाड़कर देखा गया, तो उसके निचले सिरे पर रक्त जैसा रंग लगा हुआ था। यह समझा गया कि यह नाग राजा शेषनाग का खून है, जो लौह स्तंभ को उखाड़ने की वजह से लगा है। राजा अनंगपाल तोमर ने उसे फिर से लगाने का आदेश दिया। लेकिन यह लौह स्तंभ दोबारा लगाने पर ढीला हो गया। इसीलिए इसे ‘ढीली’ कहने लगे और इसी से बिगड़ कर दिल्ली नाम पड़ा। पृथ्वीराज रासो महाकाव्य में तोमर वंश के पतन का कारण इसी बात को माना गया है।

‘दिल्ली’ या ‘दिल्लिका’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम उदयपुर में प्राप्त शिलालेखों पर पाया गया। इस शिलालेख का समय 1170 इसवीं निर्धारित किया गया है। महाराज पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का अंतिम हिंदू सम्राट माना जाता है।

 

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