दिल्ली का गौरवशाली इतिहास

दिल्ली का इतिहास
दिल्ली दुनिया के सबसे पुराने उन शहरों में से एक है, जो आज भी बसे हुए हैं। इन शहरों में इजराइल का जेरूसलम और बनारस भी शामिल हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह शहर करीब 5000 साल पुराना है। महाभारत में इसे पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्त के नाम से वर्णित किया गया है। कहते हैं दिल्ली 11 बसी और उजड़ी है।
इंद्रप्रस्थ
हस्तिनापुर के बटवारे में पांडवों को बेहद उजाड़ और बंजर भूमि खांडवप्रस्थ मिली थी, जहां भीषण जंगल थे। यहां नागजाति वास करती थी, जिसका राजा तक्षक था। पांडवों ने श्रीकृष्ण की सहायता से इन जंगलों को जलाकर खाक कर दिया और नाग जाति को मारकर भगा दिया। पांडवों के प्रति नाग राजाओं की शत्रुता का यही कारण था। इसी बदले के कारण अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को नागराज तक्षक ने डस कर मार डाला था।
महाभारत में उल्लेख है कि खांडव वन के रक्षक इंद्रदेव थे। यह भी एक कारण है कि इसे इंद्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता है। जब यह जंगल जलाया जा रहा था, तो इंद्रदेव ने अर्जुन पर वज्र से प्रहार किया था। लेकिन अर्जुन ने इस लड़ाई में सभी देवताओं, गंदर्भों और दैत्यों को हराकर इस वन को जलाकर खाक कर दिया था।
इसके बाद पांडवों और श्रीकृष्ण ने मय दानव की सहायता से खांडवप्रस्थ को बसाने की योजना बनाई। मय दानव ने इस नगर का ऐसा सुंदर मॉडल बनाकर पांडवों और श्रीकृष्ण को दिखाया, जो इंद्रदेव के अमरावति को टक्कर देता था। खांडवप्रस्थ का नाम इंद्रप्रस्थ में बदलने का यह दूसरा कारण था।
इस नगर के बीचोबीच पांडवों का भव्य महल था, जिसकी शोभा इतनी निराली थी कि दुर्योधन इसे देखने स्वयं आया था। कहते हैं, यह महल उसी स्थान पर था, जहां आज पुरानी किला स्थित है। और जिस स्थान पर पुराना किला स्थित है। दिल्ली का निगमबोध शमशान घाट वह जगह है, जहां पांडव राज युधिष्ठर ने अश्वमेध यज्ञ के उपरांत घोड़े की बलि दी थी।
इंद्रप्रस्थ के इस महल की खासियत यह थी कि इसमें एक तालाब था, जो एक घास के मैदान की तरह दिखता था। जैसे ही दुर्योधन ने उस घास के मैदान पर पैर रखा, वह तालाब में गिर गया। यह देखकर पांडवों के साथ द्रौपदी भी दुर्योधन पर हंसने लगी। न केवल इतना ही हुआ, द्रौपदी ने हद को पार करते हुए दुर्योधन से कहा, “अंधे का पुत्र अंधा।” लगता है दुर्योधन के इस अपमान की योजना पांडवों ने पहले ही बना रखी थी।
कहते हैं कि एक महायोद्धा दुश्मन के सौ आक्रमणों को भूल सकता है, लेकिन कभी भी एक महिला द्वारा किए गए अपने पिता के अपमान को कभी नहीं भूल सकता, और जो पिता एक राजा हो? द्रौपदी के इन चार शब्दों ने महाभारत की नींव रख दी थी और इसका मूक गवाह पांडवों का किला था, जिसे आज हम पुराना किला या ओल्ड फोर्ट कहते हैं।

महाभारत के बाद पांडव दुनियादारी से उदासीन हो गए थे और तपस्या के लिए हिमालय पर चले गए थे। तब अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने पांडवों के शासन का प्रबंध संभाला। एक दिन जब राजा शिकार पर निकला, तो कलयुग ने उसकी बुद्धि भ्रमित कर दी। राजा परीक्षित ने शमीक ऋषि से अपने शिकार के बारे में पूछा, तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, तब क्रोध में आकर उसने ऋषि के गले में एक मरा हुआ सर्प डाल दिया।

राजा परीक्षित को शमीक ऋषि जानते थे कि वह एक भला राजा है, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन जब उनके पुत्र ऋंगी ने आकर यह सब देखा, तो उसने राजा को शाप दिया कि सात दिन बाद नागों का राजा तक्षक उसे डसेगा और अपने राज्य खांडवप्रस्त के विनाश और विस्थापन का बदला लेगा। शमीक ऋषि को जब इसका पता चला, तो उन्होंने राजा को सावधान करवा दिया।

शाप का समाचार पाकर राजा परीक्षित ने तक्षक से अपनी रक्षा करने के लिये एक सात मंजिल ऊंचा मकान बनवाया और उसके चारों ओर अच्छे अच्छे सर्प-मंत्र-ज्ञाताओं को तैनात कर दिया। तक्षक को जब यह मालूम हुआ, तो वह एक फल में एक अति छोटे कीड़े का रूप धारण कर लिया। जब यह फल पूजा के लिए राजा परीक्षित के पास पहुंचा, तो नन्हा कीड़ा एक बड़े सर्प में बदल गया और उसने राजा को डस लिया।

पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए जनमेजय ने सर्पों की आहुति देने के लिए एक यज्ञ किया, जिसमें सारे संसार के सर्प मंत्रबल से खिंच आए और यज्ञ की अग्नि में उनकी आहुति होने लगी। जब तक्षक को इसका पता चला, तो वह इंद्र के सिंहासन से लिपट कर अपनी रक्षा की याचना करने लगा। लेकिन मंत्रों के बल से इंदऱ का सिंहासन भी हवन कुंड की तरफ आने लगा। तब आस्तिक नामक एक ऋषि ने उस नाग यज्ञ को रुकवाकर बाकी सर्पों की रक्षा करवाई।

दुर्योधन इस अपमान को कभी नहीं भूल पाया। वास्तव में द्रोपदी द्वारा कहे गए इस वाक्य ने महाभारत की नींव रखी, जिसका साक्षी इंद्रप्रस्थ का यह महल बना। माना यह जाता है कि दिल्ली के पुराने किले नीचे ही इंद्रप्रस्थ के महल के अवशेष हैं। आज भी पांडवों की माता कुंती का मंदिर दिल्ली के पुराने किले में स्थित है। माना जाता है कि पांडवों की माता कुंती यहीं पूजा किया करती थीं। इसीलिए इस किले को पांडवों का किला भी कहते हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ तक दिल्ली में इंद्रप्रस्थ नामक गांव हुआ करता था। दिल्ली के इतिहास का प्रारंभ सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा हुआ है। हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों में हुई खुदाई से इस बात के प्रमाण मिले हैं। पुरातात्विक रूप से जो पहले प्रमाण मिले हैं, उनसे पता चलता है कि ईसा से दो हजार वर्ष पहले भी दिल्ली तथा उसके आसपास शहर बसा हुआ था। मौर्य काल (ईसा से 300 वर्ष पूर्व) भी यहां एक विकसित नगर था।
लाल कोट
ऐसा माना जाता है कि तोमर वंश के शासक कई शताब्दियों से दिल्ली पर शासन करते थे। पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंद बरदाई की हिंदी रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ काव्य में इस बात का जिक्र है अनंगपाल तोमर ने ‘लाल कोट’ का निर्माण करवाया था। इसलिए अनंग पाल तोमर को दिल्ली का संस्थापक माना जाता है। लाल कोट की दीवारें आज भी मेहरौली के क्षेत्र में विद्यमान हैं। ऐसा माना जाता है कि आठवीं शताब्दी में लालकोट का निर्माण करवाया गया था। लाल कोट का अर्थ है लाल किला। 1966 में प्राप्त अशोक का एक शिलालेख (273-300 ईसा पूर्व) दिल्ली में श्रीनिवासपुरी में पाया गया। यह शिलालेख जो प्रसिद्ध लौह स्तंभ के बारे में है, अब क़ुतुब मीनार परिसर में देखा जा सकता है। इस स्तंभ को अनुमानत: गुप्तकाल में तीसरी-चौथी शताब्दी में बनाया गया था और बाद में दिल्ली लाया गया था। इस पर चंद्र लिखा है, इसलिए माना जाता है कि इसे चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने बनवाया था। लौह स्तंभ यद्यपि मूलतया कुतुब परिसर का नहीं है, अनुमान है कि यह किसी अन्य स्थान से यहां लाया गया था। संभवतया तोमर राजा, अनंगपाल-2 (1051-1081) इसे मध्य भारत के उदयगिरि नामक स्थान से लाए थे। इस लोह स्तंभ का जिक्र पृथ्वीराज रासो में भी किया है।
किला राय पिथौरा
लालकोट के राजा अनंगपाल तोमर-2 के कोई बेटा नहीं था। पृथ्वी राज चौहान के वह नाना थे। सन 1160 में चौहान शासकों ने लाल कोट को दिल्ली के तोमरों से लिया था। इसके बाद पृथ्वीराज चौहान के राज्य का राजस्थान में अजमेर से दिल्ली के लाल कोट तक विस्तार हुआ। पृथ्वीराज चौहान ने लाल कोट का नाम बदलकर किला राय पिथौरा रख दिया। पृथ्वीराज चौहान ने शहर का छह किलोमीटर तक ऊंची दीवारें बनाकर विस्तार किया। महाराज पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का अंतिम हिन्दू सम्राट माना जाता है। हालांकि, पृथ्वीराज चौहान ने शहर पर लंबे समय तक शासन नहीं किया। सन 1192 में मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को तराइन के दूसरे युद्ध में हरा दिया और उनके राज को समाप्त कर दिया। इस प्रकार भारत में मुसलिम राज की नींव पड़ी। मोहम्मद गोरी ने एक दास को दिल्ली पर कब्जा बरकरार रखने के लिए नियुक्त कर दिया। वह दास था कुतुबुद्दीन ऐबक, जिसने 1206 में मोहम्मद गोरी की हत्या होने के बाद दिल्ली सल्तनत में दास वंश नींव रखी, क्योंकि मोहम्मद गोरी का कोई पुत्र नहीं था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतुब मीनार बनावाई। उसने हिंदू और जैन मंदिर और भवनों को तुड़वाकर कुवत-उल-इसलाम मसजिद का निर्माण करवाया।
सिरी फोर्ट
कुतुबुद्दीन ऐबक के गुलाम वंश को खिलजी शासकों ने आगे बढ़ाया। गुलाम वंश के छह शासकों में सबसे प्रमुख अल्लाउद्दीन खिलजी था। उसने नर्मदा के दक्षिण में राज्य का विस्तार किया। उसने 1303 में सिरी शहर का निर्माण करवाया। हौजखास के पास सिरी फोर्ट के खंडहर हैं।
तुगलकाबाद
खिलजी वंश का अंतिम शासक खुसरो खान के हाथों मारा गया। एक तुर्क गवर्नर गयासुद्दीन तुगलक ने 1320 में दिल्ली पर आक्रमण किया और तुगलकाबाद शहर की नींव रखी, जिसके खंडहर आज भी मौजूद हैं। उसने तुगलाकाबाद फोर्ट का निर्माण करवाया था। यह शहर 1321 से 1325 के बीच बसा था।
जहांपनाह
गयासुद्दीन तुगलक के उत्तराधिकारी मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351) ने जहांपनाह के नाम से अपनी नई राजधानी बसाई। उसने अपने किले आदिलाबाद किले की दीवारों को और ऊंचा उठाया। जहांपनाह का यह क्षेत्र सिरी और राय पिथौरा किले के बीच में है। मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली से दौलताबाद राजधानी स्थानांतरित करने के लिए एक सनकी बादशाह के रूप में कुख्यात है। उसने दिल्ली की पूरी आबादी को बलपूर्वक महाराष्ट्र को दौलताबाद में नई राजधानी बनाकर स्थानांतरित कर दिया। मोरक्को का प्रसिद्ध यात्री इबन बतूता उसी के काल में भारत आया था।
फिरोजाबाद
मुहम्मद बिन तुगलक के बेटे फिरोज शाह (1351-1388) ने एक नया शहर बसाया, जिसे फिरोजशाह कोटला कहा जाता है। उसके अवशेष फिरोज शाह कोटला क्रिकेट स्टेडियम के पास आज भी मौजूद हैं। इस शहर में एक बड़ा भाग था, जिसमें महल, मसजिद और अनेकों स्तंभों वाला विशाल कक्ष और कई मंजिला तालाब था। फिरोज शाह ने अपने महल के शीर्ष पर एक 1500 साल पुराना अशोक स्तंभ भी लगवाया था, जिसे वह मेरठ से उखड़वाकर लाया था। फिरोज शाह ने दिल्ली की कई पुरानी इमारतों का पुर्निनर्माण करवाया था, जिनमें गोरी का मकबरा, कुतुब मीनार, सूरज कुंड और हौजखास हैं। फिरोज शाह की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत कमजोर हो गई। इसी बीच तैमूर लंग ने दिल्ली को लूटकर तहस-नहस कर दिया। सैयद और लोधी वंश के शासकों ने दिल्ली को स्थिर किया। इस काल का केवल एक ही स्मारक है, जो लोधी गार्डन में मकबरों के रूप में सुरक्षित है। अंतिम लोधी शासक इब्राहिम लोधी पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर के हाथों पराजित हुआ था। बाबर ने उस पर विजय प्राप्त कर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी।
दीनपनाह
बाबर के बेटे हुमायूं ने कुछ साल दिल्ली पर राज्य किया। उसने पुराने किले के अवशेषों पर दीनपनाह के नाम से राजधानी का निर्माण किया। लेकिन 1540 में वह शेरशाह सूरी से हार गया।
शेरगढ़
शेरशाह सूरी (1538-1545) ने दीनपनाह का विनाश कर दिया और उसके खंडहरों पर शेरगढ़ के नाम से किले का निर्माण करवाया। दिल्ली के चिड़ियाघर के पास यह किला स्थित है और इसे ‘पुराना किला’ यानी ‘ओल्ड फोर्ट’ कहते हैं। हुमायूं फिर सत्ता में आया, तो उसने शेरगढ़ में और निर्माण करवाए।
शाहजहांनाबाद
हुमायूं के पुत्र अकबर ने अपनी राजधानी आगरा में बनाई। उसका पुत्र जहांगीर भी वहीं से राज करता रहा। लेकिन जहांगीर के पुत्र शाहजहां (1638-1649) ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित कर दी। उसने उसका नाम शाहजहांनाबाद रखा। उसने दिल्ली में लाल किला और जामा मसजिद का निर्माण करवाया। उसने लाल किले से चांदनी चौक तक एक नहर का निर्माण करवाया, जो फतेहपुरी मसजिद तक जाती थी। बाद में उस नहर को पाट कर उस पर सड़क बना दी गई। आज वही चांदनी चौक का मुख्य बाजार है। उसने दिल्ली के चारों ओर एक चहार दीवारी का निर्माण करवाया और उसमें छह गेट लगवाए। इन गेटों के नाम हैं- दिल्ली गेट, लाहोरी गेट, तुर्कमान गेट, अजमेरी गेट, कश्मीरी गेट और मोरी गेट। औरंगजेब (1658-1707) ने शाहजहां को गद्दी से हटाकर खुद को शालीमार बाग में सम्राट घोषित किया था। कश्मीरी गेट को 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों ने तोप से उड़ दिया था, क्योंकि अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर ने विद्रोह के दौरान दिल्ली से अंग्रेजों को खदेड़कर कब्जा कर लिया था और लाल किले पर स्वंतत्रता की पताखा हरा झंडा फहरा दिया था। लेकिन बहादुरशाह जफर की यह झंड़ा केवल तीन दिन तक फहराता रहा। अंग्रेजी फौजों ने दिल्ली पर दोबारा कब्जा कर लिया और बहादुरशाह जफर को कैद करके रंगून (म्यांमार) भेज दिया, जहां उनकी मृत्यु हो गई।
लुटियन की नई दिल्ली
18वीं और 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगभग पूरे भारत के क्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया। अंग्रेजों ने कोलकाता को अपनी राजधानी बनाया। 1911 में अंग्रेजी सरकार ने फैसला किया कि राजधानी को दिल्ली लाया जाए। इसके लिए पुरानी दिल्ली के दक्षिण में एक नए नगर नई दिल्ली का निर्माण प्रारम्भ हुआ। सर एडविन लुटियन ने नई दिल्ली को बसाकर दिल्ली में ब्रिटिश निर्माण को आगे बढ़ाया। 1947 में स्वतत्रंता के पश्चात भारत सरकार ने नई दिल्ली को अपनी राजधानी घोषित किया।

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