किला राय पिथौरा विस्तार है लालकोट का

किला राय पिथौरा लालकोट का विस्तार  है। इसका निर्माण 1180 में अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान ने तोमर राजा अनंगपाल-2 के लालकोट पर अधिकार करके किया था। तोमर राजा अनंगपाल का लालकोट एक गढ़ के रूप में था, जिसे पृथ्वीराज चौहान ने एक विशाल किले के रूप में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने एक परकोटा बनाकर पूरे शहर को विशाल और ऊंची दीवारों से सुरक्षित किया था।

किला राय पिथौरा
किला राय पिथौरा

पृथ्वीराज चौहान का यह किला राय पिथौरा कहलाने लगा, क्योंकि पृथ्वीराज चौहान को राय पिथौरा भी कहते थे। उन्होंने इस किले को साढ़ छह किलोमीटर का विस्तार दिया था। आज लालकोट और किला राय पिथौरा के खंडहरों के रूप में कुछ दीवारें और बुर्ज ही बचे हैं। अभी तक इनके पूरे अवशेषों का पता नहीं लगा है।

किला राय पिथौरा
भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी पृथ्वीराज चौहान डाक टिकट

पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली पर 1180 से 1192 तक राज्य किया। उनका राज्य में दिल्ली के अलावा  हरियाणा और राजस्थान में भी फैला था। इसके अलावा उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के कुछ भाग भी उनके राज्य में थे। कई भारतीय लोक साहित्यों में इस बात का उल्लेख है कि पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गोरी को 7, 17, 21 या 28 बार हराया था और हर बार उसे जीवन दान देकर छोड़ दिया था।

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पृथ्वीराज चौहान संयोगिता का हरण करते हुए

इतिहासकार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के  दो युद्धों का उल्लेख करते हैं, जो तराइन में हुए थे। उनके अनुसार 1191 में तराइन के  प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की जीत हुई थी। लेकिन अगले ही वर्ष 1192 में तराइन के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गोरी विजयी हुआ था और वह पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर अफगानिस्तान ले गया था।

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किला राय पिथौरा का वाच टावर

चार सदी तक रहा था तोमरों का शासन

तोमर राजाओं के बारे में स्पष्ट और विस्तार से बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है। ऐसा उल्लेख मिलता है कि उनका राज्य वर्तमान दिल्ली और हरियाणा में आठवीं सदी से बारहवीं सदी तक रहा था।

 

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अनंगपाल तोमर ने स्थापित करवाया था विक्रमादित्य का यह लौह स्तंभ

चौदहवीं सदी के एक शिलालेख से पता चलता है कि तोमरों ने हरियाणा में धिल्लिका (दिल्ली) नाम से एक शहर बसाया था, जिसे बाद में चहमानस (चौहान) राजाओं ने अपने अधिकार में ले लिया था। ‘पृथ्वीराज रासो’ महाकाव्य में भी लालकोट का वर्णन है, जो तोमरों की राजधानी थी। महरौली में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का लौह स्तंभ अनंगपाल तोमर ने ही उदयगीर से लाकर यहां स्थापित करवाया था

किला राय पिथौरा
लालकोट की दीवार के भग्नावशेष

ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह पता चलता है कि तोमर वंश का आरंभ सन 736 में हुआ था। अनंगपाल तोमर-1 ने महरौली क्षेत्र में लालकोट का निर्माण करवाया था। कोट का अर्थ है किला। यह किला लाल रंग का था, इसीलिए इसे लालकोट कहते थे।

किला राय पिथौरा
लालकोट की बाहरी दीवार के भग्नावशेष

अनंगपाल-1 ने सूरज कुंड के दक्षिण में अनंगपुर गांव विकसित किया था। यह गांव आज भी फरीदाबाद हरियाणा में मौजूद है। उन्होंने अनंगपुर बांध भी विकसित किया था। यह बांध 50 मीटर चौड़ा और 7 मीटर ऊंचा है। जब 1311 में अलाउद्दीन खिलजी ने कुतुब मीनार के पास अलाई मीनार बनवाई थी, तो अनंगपुर बांध से पानी मंगवाया गया था।

किला राय पिथौरा
अलाई मीनार, कुतुब परिसर, किला राय पिथौरा

अनंगपाल के बेटे सूरज पाल ने सूरज कुंड बनवाया था, जो अनंगपुर गांव से एक किलोमीटर उत्तर में स्थित है। इसके पूर्व में सूर्य मंदिर के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं।

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अधम खां का मकबरा, किला राय पिथौरा

लालकोट की दीवारें संजय वन में अधम खान के मकबरे के पास स्थित हैं। यह दीवार कीकर के पेड़ और झाड़ियों से ढकी है। यह दीवार अब केवल छह फुट ऊंची है, लेकिन करीब 10 फुट चौड़ी है।

इतिहास में दर्ज है किला राय पिथौरा का वैभव

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पृथ्वीराज चौहान के समकालीन लेखक विबुध श्रीधर ने 1189 में किला राय पिथौरा का वर्णन करते हुए लिखा है- राय पिथौरा किले की बगल में अनंग झील थी। बाजार कपड़े, अनाज, मेवे, मिठाइयों और पुस्तकों से भरे पड़े थे। दिल्ली शिक्षा का केंद्र था। शहर के द्वारों के शिखर पर सोने की नक्काशी की गई थी। इमारतों में बेशकीमती पत्थर और रत्नों की नक्काशी की हुई थी।

विबुध श्रीधर, पृथ्वीराज चौहान के समकालीन लेखक
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मंदिरों को तोड़कर बनाई गई थी कुवुत-उल-इसलाम मसजिद

तोमर और चौहान राजाओं ने लालकोट व किला राय पिथौरा क्षेत्र में बहुत से भव्य मंदिरों का निर्माण किया था। लेकिन इसलामिक आक्रमणकारियों ने सभी मंदिरों को नष्ट कर दिया। कुतुब परिसर में बनी कुव्वत-उल-इसलाम मसजिद का निर्माण 1192 में कुतुबुदीदन ऐबक ने किया था। इतिहास में दर्ज है कि इस मसजिद के निर्माण में 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर उसकी साम्रगी का इस्तेमाल किया गया था।

किला राय पिथौरा
कुवुत-उल-इसलाम मसजिद, कुतुब परिसर, किला राय पिथौरा

कुवुत-उल-इसलाम मसजिद के स्तंभों और दीवारों पर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लगी हैं। इनमें अप्पसरा, गंधर्व और जैन तीर्थंकर स्वामी महावीर की भी प्रतिमाएं हैं। इस मसजिद में इल्तुतमिश ने 1230 और अलाउद्दीन खिलजी ने 1351 में कुछ विस्तार भी किए थे। इसी परिसर में सम्राट विक्रमादित्य का लौह स्तंभ है, जिसे अनंगपाल तोमर उदयगीर से लाए थे।

खोजा नहीं जा सका है किला राय पिथौरा का पूरा घेरा

किला राय पिथौरा में 28 बुर्ज हैं। इनमें बुर्ज नंबर 15 सबसे बड़ा है। इसका व्यास 95 मीटर है और इसकी ऊंचाई 14 मीटर है। फिलहाल किला राय पिथौरा के नाम पर कुछ दीवारें और बुर्ज ही बचे हैं। समय की मार के साथ सब बिखर गए हैं।

किला राय पिथौरा की भग्न दीवार

महरौली-बदरपुर रोड़ और अधचीनी से कुतुब मीनार की ओर जाने वाली रोड किला राय पिथौरा को काटती हुई जाती है। किला राय पिथौरा के खंडहर संजय वन और ‘साउथ दिल्ली रिज’ के क्षेत्र में भी फैले हुए हैं। किलेबंदी के दिखाई देने वाले भाग कुतुब गोल्फ कोर्स के आगे ‘किला राय पिथौरा पार्क’ में स्थित हैं। कुतुब मीनार का क्षेत्र किला राय पिथौरा का ही भाग है। राय पिथौरा के अवशेष अभी भी दिल्ली के साकेत, महरौली, किशनगढ़ और वसंतकुंज के क्षेत्रों में दिखाई देते हैं।

किला राय पिथौरा
किला राय पिथौरा मुख्य स्मारक

गौरतलब है कि किला राय पिथौरा का पूरा घेरा अब तक खोजा नहीं जा सका है। दिल्ली के प्राचीन शहर माने जाने वाले जहांपनाह की दीवार भी किला राय पिथौरा से मिलती है। यह दीवार साकेत में प्रेस एन्क्लेव के पास किला राय पिथौरा की दीवार से मिलती है। जहांपनाह को मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351) ने पहले दो प्राचीन शहर किला राय पिथौरा और सीरी के बीच बसे इलाके को घेरकर बसाया था।

पृथ्वीराज चौहान की प्रतिमा, किला राय पिथौरा

किला राय पिथौरा में पृथ्वीराज चौहान की घोड़े पर सवार विशाल प्रतिमा है। किला राय पिथौरा के परिसर के बीचोबीच एक संग्रहालय है, जहां चित्र प्रर्दिशत किए गए हैं। एक जमाने में किला राय पिथौरा के 13 प्रवेश द्वार थे।

गुलाम वंश के सुल्तानों ने किया था किला राय पिथौरा से शासन

ऐसा माना जाता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने राय पिथौरा किले में कोई खास बदलाव नहीं किया था। 1192 में पृथ्वीराज चौहान के परास्त होने के बाद मुहम्मद गोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का शासन सौप दिया था। 1192 से 2006 तक उसने एक सूबेदार के रूप में दिल्ली सल्तनत को चलाया। 1206 में मुहम्मद गोरी की मृत्यु होने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने आप को दिल्ली का सुल्तान घोषित किया और गुलाम वंश की नींव रखी।

किला राय पिथौरा
कुतुबुद्दीन ऐबक

1206 से 1290 तक गुलाम वंश के सभी शासकों ने राय किला पिथौरा से ही अपना शासन चलाया। यह क्षेत्र महरौली में आता है, जिसका अर्थ है मिहिरावली अर्थात मिहिर का निवास। इसका निर्माण गुर्जर सम्राट मिहिर भोज (836-885)  ने करवाया था। सम्राट मिहिर भोज का शासन काल हिमालय की वादियों से दक्षिण में नर्मदा नदी तक, उत्तरपूर्व में सतलज नदी और पूर्व में बंगाल तक फैला था।

कैसे पहुंचे?

दिल्ली मेट्रो की यलो लाइन पर साकेत मेट्रो स्टेशन के बाहर निकलते ही ‘किला राय पिथौरा’ का बोर्ड लगा है। डीटीसी के बस नंबर 534 और  680 किला राय पिथौरा से होकर गुजरती हैं।

गूगल मैप

कनॉट प्लेस से दूरी

किला राय पिथौरा की कनॉट प्लेस (राजीव गांधी मेट्रो स्टेशन), नई दिल्ली से दूरी 14.5 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से अशोका रोड होकर जाने में 45 मिनट का समय लगता है।

अपने स्थान से किला राय पिथौरा की दूरी और कार से लगने वाला समय जानने के लिए ऊपर िडस्टेंस कैलकुलेटर पर क्लिक करें।

किला राय पिथौरा के लिए दिल्ली के प्रमुख स्थानों से बस सेवा हैं। आप बस में सफर करने के लिए एक दिन का पास भी बनवा सकते हैं, ताकि बार-बार बस बदलने में आपको ज्यादा पैसे नहीं देने पड़ेंगे। किला राय पिथौरा का नजदीकी स्टेशन साकेत है, जो यला लाइन पर पड़ता है। आप बस औऱ मेट्रो रूट की जानकारी के लिए ऊपर बस और मेट्रो रूट पर क्लिक करें।

लालकोट के फतेह बुर्ज के पास है जिन्नों का वास

आदम खान के मकबरे से दाईं ओर मुड़ने पर लालकोट का प्रवेश द्वार फतेह बुर्ज दिखाई देता है। अगर आपके अंदर साहस और रोमांच है, तो आप महरौली ईदगाह जाएं, जिसे आशिक अल्लाह दरगाह भी कहते हैं। इस दरगाह को 1317 में  सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक शाह खिलजी ने बनावाया था।

हजरत आशिक अल्लाह की मजार, किला राय पिथौरा

दरगाह के पीछे जाने पर लालकोट की दीवार भी दिखेगी। वहां झाड़ियों और ऊबड़-खाबड़ मार्ग में आपको अनजान कब्रें दिखाई देंगी। कहते हैं वह जिन्नों का स्थल है और वहां जिन्न देखे जा सकते हैं। अगर कोई 41 दिन दरवेश की इबादत करे, तो वह जिन्नों को देख सकता है और उनसे बात कर सकता है। जिन्न हमेशा रात में ही दिखाई देते हैं। 

यह क्षेत्र संजय वन में आती है, जो बहुत निर्जन और डरावना वन माना जाता है। इसमें दिल्ली का राजकीय पशु नील गाय देखी जा सकती हैं।

नजदीकी आकर्षण

किला राय पिथौरा  में 17 आकर्षण हैं, जो इस प्राचीन किले की सीमारेखा में आते हैं। इनके नाम हैं- 1. कुतुब परिसर, 2. आजिम खान का मकबरा, 3. बलबन का मकबरा, 4. चौमुखा द्वार, 5. जमाली कमाली मसजिद और मकबरा, 6. नाजिर का बाग, 7. जफर महल, 8. गंधक की बावली, 9. राजों की बैन, 10. अधम खां का मकबरा, 11. गजनी द्वार, 12. अनंग ताल, 13. रणजीत द्वार, 14. सोहन द्वार, 15. अधचीनी द्वार, 16. बदायूं द्वार, 17. बरका द्वार

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